गुल्मवायु (हिस्टीरिया)

गुल्मवायु (हिस्टीरिया)

कारण व चिकित्सा
सामान्य परिचय :-
गुल्मवायु स्वयं कोई रोग नहीं है , बल्कि यह दूसरे रोगों का उपसर्ग स्वरूप एक रोग लक्षण है जिसमे स्नायुतंत्र प्रभावित होते हैं और स्वतंत्र रोग सदृश्य प्रकट होते है। मृगी (मिर्गी ) सदृश्य लक्षण (दौरे) स्त्रियों मेँ पड़ता हुआ देखा जाता है।

भ्रम :-
आम धारणा है कि मात्र कामवासना की अतृप्ति के कारण ही यह रोग होता है, जबकि वास्तविकता यह है की मात्र यही कारण नहीं होता। इसके अतिरिक्त भी अनेक कारण होते हैं , जिसके कारण यह रोग होता है।

कारण:-
कामवासना अतृप्ति के अतिरिक्त , जरायु एवं डिम्बाशय का दोष ,मानसिक आघात , शोक , प्रेम में असफलता , भय , बार -बार क्रोध का घूंट पीना (तनावग्रस्त ), परिश्रम के अभाव में , शारीरिक व्यायाम का न होना आदि मुख्य कारण है। क्योंकि, देखा गया है कि

शारीरिक परिश्रम करने वाली लड़कियों या औरतों के तुलना में आरामतलब लड़कियों या औरतें अधिक शिकार होते है। आयुर्वेदों के अनुसार रुक्षादि कारणों से प्राकुपित वायु अपने स्थान को छोड़कर , हृदय में जाकर पीड़ा (वेदना) उतपन्न करता है। इसमें सिर (मस्तक) और कनपटियों में भी पीड़ा होती है। यह पीड़ा इतनी अधिक होती है कि रोगिणी अपने आप पर से निंयत्रण खो बैठती है। पुनः वायु पीड़ा का वेग जब शमित (कम ) होता है तो होश में आ जाती है।
सारांश रूप में यह मानना होगा कि वातनाड़ी की दुर्बलता ही इस रोग का मुख्य कारण है। जिससे रोगिणी मानसिक रूप से , परिस्थियों से समझौता नहीं कर पाती है और इस रोग का शिकार बन जाती है। यही कारण है जब शादीशुदा हो जाती है , या बच्चों की माँ बन जाती है तो बिना दवाओं के भी स्वतः ठीक हो जाती हुई देखी गयी है।

लक्षण :-
दौरा पड़ने के पहले रोगिणी को संभलते हुए या संभलने का प्रयास करते हुए देखा गया है , यह स्पष्ट करता है कि रोगिणी पूर्वाभास हो जाता है। कुछ अपने कपड़े को संभालने लगती है तो कुछ सही स्थान की ओर बढ़ती हुई गिरकर बेहोश है। कुछ का ऐसा अनुभव है कि पेट से गले की और कुछ गोला सा उठता है , संभवतः वह वायु का गोला हो, इसलिए इसका नाम गुल्म वायु भी है। दौरा के समय मुठ्ठियों बांध जाती है, शरीर धनुषकार टेढ़ा हो जाता है, हाथ- पैर बेचैनी के साथ इधर -उधर पटका करती है। सांस रुक जाने का भय नहीं रहता। यद्यपि देखने से यही प्रतीत होता है कि सांस रुकने को है। आँखे बंद हो जाती है या टकटकी सी लग जाती है। कुछ देर तक ऐसी परिस्थिति रहने के बाद अनजाने में पेशाब होकर दौरा का लगभग अंत हो जाता हो जाता है। रोगिणी धीरे – धीरे सामान्य हो जाती है। पूर्ण होश में आने पर आस-पास के उपस्तिथ लोगों को इस तरह घूरती है जैसे वह जानना चाह रही हो कि इतने लोग यहां क्यों है ? क्योंकि इस बीच की अवधि में वो लगभग चेतना शून्य रही होती है। हां जब वो अपने शरीर की ओर ध्यान देती है, तो शिथिलता का अनुभव कर समझ जाती है कि शायद आज फिर मुझे दौरा पड़ा था। फिर गोले गले की ओर उठने की याद आती है। (याद आ जाती है )

परिणाम:-
शादी के बाद, बच्चों की माँ बनने के बाद माहौल एवं शारीरिक, मानसिक परिवर्तन बाद प्रायः रोगिणी मुक्त हो जाती है। अतः उम्र और परिस्तिथि को देखते हुए उचित सलाह देने के साथ ही समुचित चिकित्सा व्यवस्था करनी चाहिए। शादी की उम्र हो गई हो तो शादी की राय दें ,शादी हो गई हो तो संतान में देर होने का कारण का भी निदान करें। शादी संतान युक्त हो तो स्थान परिवर्तन की राय उचित है।

मिर्गी और हिस्टीरिया में अंतर :-
मिर्गी या मिरगी का शिकार स्त्री -पुरुष बच्चे -बूढे कोई भी हो सकता है जबकि हिस्टीरिया की रोगिणी प्रायः स्त्री ही होती है। युवा यौवन प्राप्त अवस्था में। कुछ ग्रँथों में कहीं -कहीं पुरुषों में भी लक्षण स्पष्ट होने की बात कही गई है। पर वे यदि कहीं लक्षण स्पष्पट भी हुए होंगे तो उसे अपवाद स्वरूप ही माना जायेगा।
पलकें उठा कर देखने से यदि सामने का भाग पूर्णतः सफ़ेद हो तो
मिर्गी का दौरा समझें अथवा हिस्टीरिया का। यह परीक्षण दौरा के
समय करें। मिर्गी में दौरा के समय पूर्णतः चेतना शून्य होता
है,जबकि हिस्टीरिया में लगभग चेतना शून्य होता है।

आयुर्वेद :-
० अपतन्त्रकारि बटी या हिस्टीरिया बटी इस रोग की प्रमाणित
औषिधि है। नित्य ३-४ मात्रायें दें। दो -दो गोली कर खिलाने के
बाद ऊपर से मांस्यादि क्वाथ पिलावें। लगातार २४ घंटे दौरा आने
वाली रोगिणी को भी यदि नियमित रूप से २४ दिन सेवन कराया

जाय तो रोगिणी आरोग्य हो जाती है। चाहे रोग का लक्षण कितना
ही जटिल क्यों ना रहा हो।
० सर्पगंधा चूर्ण एक माशा की मात्रा में सुबह -शाम जल के साथ
सेवन करने से ही हिस्टीरिया रोग नियंत्रित रहती है। धीरे -धीरे
ठीक हो जाती है।
० रस सिन्दूर एक-एक रत्ती, छोटी हरड़ और सौंफ के क्वाथ के साथ
सुबह-शाम दें, अथवा विदलवन और अजवायन चूर्ण के साथ दें तो
आशातीत लाभ होता है। अनुपान में गरम जल का प्रयोग करें।
० मल सिंदूर आधा से एक रत्ती सुबह -शाम अदरक के रस एवं
शहद के साथ सेवन करावें तो कठिन से कठिन गुल्मवायु
(हिस्टीरिया ) ठीक हो जाती है।
० सुवर्ण समीर पन्नग रस १-१ रत्ती नित्य सुबह-शाम करावें तो
चिंता, शोक , भय या क्रोध जैसे मनोविकार के कारण उत्पन्न रोग
ठीक हो जाते हैं।
० चतुर्भुज रस १ गोली सुबह शाम जटामांसी क्वाथ के साथ सेवन
करने से निश्चित रूप से हिस्टीरिया दूर होती है।
० चतुर्मुख रस १ से २ गोली सुबह शाम डेढ़ मसे त्रिफला चूर्ण के
साथ देने से हिस्टीरिया के साथ -साथ स्नायतंत्र के अन्य रोग भी दूर
हो जाते हैं। पाचन संस्थान की क्रिया भी ठीक हो जाती हैं।

० चंद्रोदय रस १ से २ गोली जीरे का चूर्ण एवं गुड़ के साथ सुबह –
शाम सेवन करने से अतृप्त काम -वासना के कारण उतपन्न
हिस्टीरिया में लाभ होता। है
चिंतामणि चतुर्मुख रस १-१ गोली कर सुबह -शाम त्रिफला चूर्ण
एवं शहद के साथ सेवन करने से गुल्मवायु ठीक हो जाता है।
योगेंद्र रस १-१ गोली को सुबह -शाम मिश्री मिले जटामांसी के
साथ सेवन करने से लाभ होता है।
० अश्वगंधारिष्ट ढाई तोला की मात्रा में , समभाग जल मिलाकर
भोजन के बाद दिन -रात दोनों समय सेवन करने से अच्छा लाभ
होता है। नियमित सेवन से स्थानीय लाभ होता है।
० मासिक विकार के कारण रोग की उत्पत्ति हो अथवा रोग के
साथ -साथ मासिक विकार लक्षण वर्तमान हो तो अशोकारिष्ट ढाई
तोला की मात्रा में समभाग जल मिलाकर दिन और रात में दें।
सफलता मिलेगी।
० मस्यादि क्वाथ अकेले भी यदि ४ तोले की मात्रा में सुबह -शाम
या भोजन के बाद दिन -रात सेवन करायी जाती है तो लाभ अवश्य
ही मिलेगा।
० चैतस घृत ६ मसा से १ तोला तक गरम दूध में मिलाकर सुबह –
शाम करने से लाभ होता है।

सुरक्षित नुस्खे :-
०घोड बच (बच ) २ से ४ चार रत्ती की मात्रा में शहद या दूध के
साथ नित्य एक मात्रा देने से हिस्टीरिया दूर हो जाती पर मात्र
अधिक ना हो , इसे ध्यान रखें अन्यथा वमन , सिरदर्द आदि हो
सकता है।
० हिस्टीरिया का दौरा आने पर हल्दी का धुंआ सुँघायें
० दौरा के समय लहसून सुंघाने से मूर्छा दूर होती है। बीच -बीच
में सुंघाते रहने से दौरा की संभवाना टल जाती है।
० कपूर कचरी का फाँट एक औंस की मात्रा में सुबह -शाम सेवन
कराने से लाभ मिलता है।
० महानिंब के पत्तों का क्वाथ चार तोले की मात्रा में सुबह -शाम
सेवन कराने से हिस्टीरिया से मुक्ति मिलती है।
० सहिजन की जड़ की छाल का क्वाथ हींग एवं सैंधव मिलाकर
सेवन करने से अपतन्त्रक (Hysteria ) में लाभ होता है।
० नौसादार और चूना समान मात्रा में मिलाकर पोटली किसी सूती
कपडे में बांध कर दौरा के समय सुंघावें। तत्काल मूर्छा दूर होगी ,
ठीक अमोनिया की तरह।