वायु को भगवन कहा गया है क्योंकि वायु गति प्रदान करता है।
ह्रदय में प्राणवायु , गुदा प्रदेश में अपानवायु , नभमंडल में
समानवायु , कंठ में उदानवायु , एवं समस्त शरीर में व्यनवनवायु
– इस प्रकार इन पांच प्रकार के वायु का साम्राज्य हमारे शरीर में
है।
आचर्यों ने वायु के महत्व को प्रतिपादित करते हुए सर्व सम्मति से
स्वीकार किया है कि
“पित्त : पंगु, कफ : पंगु पंगुओं मालघातवः
वायुमा यत्रानियन्ती तत्रगच्छति मेघवत “अर्थात शरीर में पित्त , कफ , मल , धातु सब पंगु है , यह शरीर में
वायु के द्वारा ही गति प्राप्त करते हैं। जिस प्रकार आकाश में छाये
मेघ को वायु एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाता है उसी प्रकार
शरीर में वात , पित्त , कफ एवं मल धातु को ले जाता है। वायु ही
सबके उत्पत्ति का कारण है। पंचभूतों में यह प्रधान है। यह सभी
पदार्थो में व्याप्त है, पृथ्वी आकाश में स्वतंत्र विचरण करता हैं ,
विपरीत परिस्तिथि में यह यम की तरह प्राण हरने वाला भी है
लेकिन अनुकूल परिस्थिति में यह प्रजापति है अर्थात सृष्टि का रक्षक

है , विष्णु के सामने समस्त प्राणी के प्राण में रहते हुए उसका
पालन करता है।
वायु के गुण :-
रुक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म ,चल , विशद ,खर ये वात के गुण हैं। “सर्वदा सर्वभावनाम सामान्य वृहीकारणम हृास हेतु विशेषश्च”
आयुर्वेद के सिद्धान्त के अनुसार इन गुणों के सामान गुण वाले
प्रदार्थ के सेवन एवं आहार -विहार से वात प्रकुपित वात की
चिकित्सा के लिए इन गुणो के विपरीत आहार -विहार को अपनाने
से वाट का शमन होगा।
” सर्वाही चेष्टा वातेन स प्राणः प्राणिनां स्मृत” जब वायु
पृकृतिस्थ होकर संसार में विचारण करता है , सूर्य , चंद्र , नक्षत्र
गृह , तारा मंडल को आकाश में गति देता है,बादल की सृष्टिकर
जल बरसाता है उसी प्रकार शरीर में अनुकूल वात पृथ्वी।
अग्नि,आकाश, जल इन चारो महाभूत को गति प्रदान कर शरीर को
धारण करता है।
परन्तु जिस प्रकार प्रतिकूल वायु संसार के विनाश का कारण
बनाता है , पर्वत के शिखर। बड़े -बड़े पेड़ों को उखाड़कर , समुन्द्र
को उत्पीड़ितकर हलचल मचाकर , जलाशय में लहर को उत्पन्न
करता है। दावानल का कारण बनता है अर्थात संसार में प्रलय

उत्पन्न करता हैं (केदारनाथ बद्रीनाथ घटना इसका ज्वलंत
उदाहरण है। ) उसी प्रकार शरीर में प्रकूपित वात, बल ,वर्ण , आयु
एवं सुख का क्षय करता हैं , गर्भ का विनाश करता है गर्भस्थ शरीर
में विकलांगता का कारण बनता हैं जिससे गर्भस्थ शिशु अँधा ,
लंगड़ा , बहरा हो सकता है। वात के प्रकोप से मन में अकारण भय
उत्पन्न होता है। शोक , मोह होता है , प्राणवायु के रुक जाने से
मृत्यु हो जाती है अर्थात शरीर की समस्त चेष्टा वात से ही होती है।
ऋतु की अनुसार ग्रीष्म ऋतु में वायु का संचय , वर्षा ऋतु मैं
प्रकोप एवं शरद ऋतु में इसका शमन होता है। वय के अनुसार
बाल्यावस्था में वायु प्रधान होता है युवावस्था पित्तप्रधान एवं
वृद्धावस्था कफ प्रधान होता है। जितनी चपलता। चंचलता वाट
के कारण बच्चों में पायी जाती है वृद्धावस्था आते तक कफप्रधान
होने से जड़ता आ जाती है। उसी प्रकार दिन एवं रात्रि का प्रथम
पहर वात प्रधान होता है वर्षा ऋतु में वायु कुपित होकर पित्तकफ
को भी दूषित कर देता है इसलिए वर्षा ऋतु के शरीर वेदना दाह ,
थकावट , कमजोरी आदि लक्षण दिखते हैं। इसलिए वर्षा ऋतु में
प्रकुपित वायु की शांति के लिए , खटटा , नमकीन तथा स्निग्ध
प्रदार्थ को भोजन में शामिल करे। शहद का सेवन करेँ।
हेमंत ऋतु (शीत ) में भी वात का प्रकोप रहता हैं पर इस समय
जठराग्नि प्रबल रहती है इसलिए इस समय वात के शमन के लिए

दूध तथा उससे बने प्रदार्थ , गन्ना एवं गन्ना से बने गुड़ , खांड , नये
चांवल का भात, गरम जल आदि का सेवन करें स्निग्ध प्रदार्थ से
उबटन , तेल शामिल , धूपस्नान , गर्म भूमि एवं गृह में निवास करें।
अर्थात हम वात के संचय , प्रकोप एवं शमन होने की ऋतु , वय,
आदि की जानकारी होने पर उसी प्रकार से आहार-विहार को
अपनाकर अपने शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं। वायु के गुण के
विपरीत आहार -विहार का सेवन कर वाय को अनुकूल रखते हुए
स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। वायु से ही हमारे जीवन की डोर टूटा
सब कुछ समाप्त अर्थात वायु ही प्राण है। अतः वात रोगों से बचने
के लिए उष्ण , स्निग्ध आदि पदार्थो का सेवन करें एवं स्वयं को शीत
से बचाकर रखें।