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स्नान-

स्नान-

एक सामान्य सा काम जिसे सारा विश्व अपनी दिनचर्या में शामिल
करता हैं और स्वास्थ्य रक्षण की एक आवश्यक बात मानता है।
हमारे प्राचीन आचर्यों ने इसके महत्व को हर आदमी को समझाने
के लिए इसे धार्मिक संस्कारों के साथ जोड़ दिया और कुछ इस
तरह से बताया ताकि आम आदमी इससे सदैव लाभान्वित होता
रहे।
ज्यादातर लोग नहाने का अर्थ शरीर पर पानी डालो , साबुन ,
रगड़ों, पोंछो और बस तैयार यही लेते हैं। हर कोई कहता है बस
पांच मिनट में नहाकर आता हूँ। यदि घर पर कोई महिला या
पुरुष नहाने में ज्यादा समय लगाए तो समझों वह चर्चा का विषय
हो जाता है।
आखिर नहाने की क्या जरूरत है। क्या स्नान भी कोई ऐसा काम है
जिस पर इस तरह से विमर्श आवश्यक है। स्नान भारत में रोज एक
या दो बार करना क्यों जरूरी है –
१. उष्णकटिबंध में होने के कारण ज्यादातर सूर्य की किरणे सीधी
पड़ती हैं और इस कारण गर्मी , पसीने की अधिकता रहती है।

२. तीन ओर से समुद्र से घिरा होने के कारण वातावरण में आर्द्रता
रहती है जिससे पसीना सूख नहीं पाता है। चिपचिपाहट वाली
गर्मी त्वचा पर दुष्प्रभाव डालती है।
३. कृषिप्रधान देश होने के कारण ज्यादातर लोगों का समय सूर्य के
तेज प्रकाश में , धूप में ही गुजरता है। सूर्य की किरणों के सतत
पड़ते रहने के कारण शारीरिक तापक्रम में वृद्धि के साथ -साथ
त्वचा पर दूषित पदार्थों का जमाव भी पर्याप्त मात्रा में होता है।
४. हम मसाला उत्पादक देश के नाम से भी जाने जाते हैं। जहाँ
मसालों की पैदावार होती हो वहां पर भोजन में इनका प्रयोग न
हो कैसे संभव है ? चटपटा भोजन पित्त को बढ़ाने का काम करता
है। ऐसे समय में पित्त के शमन और व्यवस्थापन के लिए स्नान से
अच्छा शीतलदायक और क्या हो सकता है ?
५.चटपटा भोजन कोलिनर्जिक तंतुओं को भी उत्तेजित करता है।
इससे शरीर के चयापचय की प्रक्रिया पर पर्याप्त प्रभाव होता है।
इससे होने वाले दुष्प्रभावों को कम करने में स्नान की महत्वपूर्ण
भूमिका होती है।
६. वातावरणीय प्रदूषकों की भरमार , वनों अनियंत्रित कटाई के
कारण होने वाला वायु प्रदूषण और शुद्ध ऑक्सजीन की होती कमी

शरीरनाश का कारण होती है और ऐसे में स्नान शरीर शुद्धि और
स्वास्थ्यरक्षण में मददगार साबित होता है।
हमारे आचार्यों ने स्नान को महत्वपूर्ण मानते हुए इसका प्रयोजन
शरीर मांस शुद्धि के लिए करने का निर्देश दिया गया है। शास्त्रों में
स्नान के प्रकारों में गौणस्नान और मुख्यस्नान इस तरह से विभेद भी
मिलते हैं।
गौणस्नान : जिस समय समान्य स्नान या मुख्य स्नानकर्म का
सम्पादन संभव न हो उस समय पर गौणस्नान करने का निर्देश
किया गया है। इसे मुख्य स्नान के समकक्ष ही मान्यता प्रदान की गई
है।
गौण स्नान कब करें –
१.प्रवासकाल में।
२. जल के आभाव में.
३. स्वास्थ्य की गड़बड़ी होने पर।
४. बाहर से आने पर।
५. भोजन से पहले और भोजन के बाद।
६. बुरी ख़बरें सुनने पर , शोक और रोने के बाद।

७. मानसिक अस्वस्थता की स्थिति में।
गौण स्नान का तरीका :-
१. सजल स्नान की स्थिति में गौण स्नान करते समय चेहरा , दोनों
हाथों को कोहनी तक और पैरों को घुटनों तक अच्छी तरह से धोवें।
मुंह में अच्छी तरह से पानी भरकर ५ से ७ कुल्ले इस तरह से करें
कि संपूर्ण मुख की सफाई हो जाये। मुस्लिम समुदाय हर बार
नमाज के पहले गौणस्नान करता है।
२. निर्जल स्नान की स्थिति मेँ गौणस्नान करते समय विविध तरीकों
का पालन किया जा सकता है। शास्त्रों में सप्तविध स्नानों के बारे में
जो कहा गया है वह इसे के अंतर्गत आता है।
शास्त्रों में गौणस्नान के प्रकारों में सप्तविधि स्नान के बारे मेँ कहा
गया है। ये सप्तविधि स्नान कुछ इस तरह से बताये गए है :-
२.मन्त्र स्नान :-
विविध प्रकार के मन्त्रों से अभिमंत्रित जल को शरीर पर छिड़कर
शरीर की शुद्धि की जाती है। इस क्रिया में प्रायः गायत्री मन्त्र का
प्रयोग किया जाता है और इस कारण इसे गायत्री भी कहते हैं।
३. तीर्थस्नान :-

पूजनीय व्यक्तियों के चरणों , देवमूर्तियों; तुलसी , बिल्च , दूर्वा,
दर्भ आदि के संपर्क से तैयार जल से शरीर का प्रोक्षण किया जाता है
और स्नान क्रिया संपादित की जाती है।
४. भस्मस्नान :-
कुछ जगहों पर इसे अग्निस्नान के नाम से भी जाना जाता है। इसमें
शरीररांगो पर भस्म का लेपन किया जाता है।
५. वायुस्नान :-
इसमें थोड़ी देर तक हवा मेँ बैठकर शरीर की शुद्धि का उपक्रम
किया जाता है।
६. वरुणस्नान :-
इसमें जल की थोड़ी सी मात्रा लेकर शरीर की शुद्धि का उपाय
किया जाता है। यदि जल पर्याप्त मात्रा में हुआ तो अच्छा वरना
पोंछ पोंछकर भी काम चला लिया जाता है।
७. विष्णुस्नान :-
कुछ लोग इसे मानस स्नान भी कहते हैं। इसमें विष्णुनाम का स्मरण
और ध्यान किया जाता है।
वैसे तो स्नान शरीर की अंर्तबाह्य शुद्धि की लिए किये जाने का
निर्देश है। पर केवल शरीर को गिला कर लेने की बजाय यदि

सर्वांग शौच हो सके तो ज्यादा बेहतर होता है। शौच यानि समग्र
शुद्धि के लिए यदि स्नान किया जाये तो ही यह प्रभावी हो सकता
है।
स्नान का काल :-
१ ब्रम्ह मुहूर्त में स्नान करें।
२ पर्वो और संक्रातियों पर अवश्य स्नान करें।
३. श्मशान भूमि या बुरी ख़बरों के बाद अवश्य स्नान करें।
४. गर्मियों में सायंकाल भी स्नान करें।
५. खुली हवा में , नदियो, तालाबों मेँ स्नान करें।
६. स्नान की समाप्ति के समय यदि सूर्योदय हो इससे अच्छा कोई
संयोग नहीं हो सकता है। शरीर शुद्धि और देवाराधन के साथ –
साथ अनेक वैज्ञानिक दृष्टिकोण इसमें समाहित हैं।
स्नान कब न करें :-
१ व्यायाम के आधे घंटे बाद और भोजन के तीन घंटे बाद तक।
२ उपवास , और अत्यंत श्रम के तत्काल बाद।
३. रोग से पीड़ित होने पर।
४. मध्यरात्रि में , प्रहरसंधि में, नैसर्गिक आपदाओं के समय।

५. बहुत अधिक वस्त्र पहनकर।
६. अज्ञात जलाशयों ,नदियों , कुओं में।
स्नान के निषेध के वैज्ञानिक तर्क :-
व्यायाम के बाद स्नान करने से सर्दी का प्रकोप होता है। व्यायाम के
दौरान शरीर का तापमान बढ़ जाता है। शरीर में रक्त प्रवाह बढ़
जाता है जिससे पसीने की प्रवृति होती है। पसीने की प्रवृति शरीर
के तापमान को नियंत्रित करने के लिए ही होती है। इस दौरान
शरीर की शिराएं फ़ैल जाती हैं जिससे ज्यादा से ज्यादा रक्त इनमें
से प्रवाहित होता है। यदि इसके बाद तत्काल शीतल जल से स्नान
किया जावे तो कोशिकाओं में संकोच होने के कारण शरीर की गर्मी
का निष्कासन ठीक तरह से नहीं हो सकेगा और अकस्मात तापमान
परिवर्तन के कारण शरीर की ताप नियंत्रक प्रणाली पर दुष्प्रभाव
होगा। नहाने से शरीर का तापमान नियमन का काम भी प्रमुखता
से होता है और इस कारण व्यायाम के बाद नहाने से हानि ही
होगी।
आयुर्वेद के अनुसार व्यायाम के बाद पित्त और वात की अधिकता
हो जाती है। वात आशुगामी और पित्त द्रवगुण वाला होता है।
वात स्वयं की वृद्धि के कारण पित्त को लेकर चलता है और स्वेद की
प्रवृति में मदद करता है। यह ऐसे समय में कफ को भी अपने स्थान

पर व्यवस्थापित करता जाता है। यदि व्यायाम के तुरंत बाद नहा
लेने पर कफ का प्रकोप होता है क्योंकि शीत की वृद्धि कफ के
घनत्व में वृद्धि तो करती ही है साथ ही वात को भी शीत गुण के
कारण बढ़ाने का काम करती है। इसलिए आयुर्वेद के आचार्य भी
व्यायाम के तत्काल बाद भोजन , व्यवाय याने संभोग, स्नान , तेज
हवा का सेवन इन बातों का निषेध करते हैं।

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