पीपली की खेती इसके फलों (स्पाइक्स) तथा जड़ों (मूल) की प्राप्ति के लिए की जाती है। प्राय: इसकी खेती तीन से पांच के उपरांत पिपली के पौधे पर फल आना प्रारम्भ हो जाते है जो की प्रतिवर्ष आते है। पांच वर्ष तक स्पाइक्स के रूप में पिपली की फसल लेने के उपरांत इसके पौधे को उखड क्र इसका मूल (पिपली मूल) प्राप्त कर लिया जाता है।

उपयुक्त भूमि:- पिपली ऐसी जीवांश युक्त दोमट एवं लाल मिट्टियों में अच्छी प्रकार उगाई जा सकती है, जिसमें लाल विकास की पर्याप्त व्यवस्था हो। सामान्य प.एच. मान वाली ऐसी मिट्टियों जिसमे नमी सोखने की क्षमता हो इसके लिए उपयुक्त है।

पिपली का प्रवर्धन बीजों से भी किया जा सकता है, सर्कस से भी, कलमों से भी तथा इसकी शाखाओं की लेयरिंग करके भी। वैसे व्यवसाहिक कृषिकरण की दृस्टि से इसकी कलमें द्वारा प्रवर्धन किया जाना ज्यादा उपयुक्त होता है। इसके लिए सवर्प्रथम इन्हे में तैयार किया जाता है।

नर्सरी बनाने का समय- पिपली की नर्सरी बनाने का उपयुक्त समय फरवरी-मार्च माह (महाशिवरात्रि के समय का) होता है।

खेत की तैयारी:- नर्सरी में तैयार किये गए पौधे जो लम्बे हो तथा जिसे से प्रत्येक में ३ से ६ तक आंखे (नोड्स) हो, काट करके पॉलीथिन की थैलिया में रोपित कर दी जाती है। रोपाई से पूर्व इन थैलियों को मिटी, रेत तथा गोबर की खाद (प्रत्येक का ३३ प्रतिशत) डाल करके तैयार किया जाता है। लगभग डेढ़ से दो महीने में ये कलम खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाती है। मुख्य रेत की तयारी करने के लिए खेती की २-३ बार अच्छी प्रकार जुताई करके उसमे प्रति एकड़ ५ से ७ टन तक गोबर की पाकी हुई खाद मिला दी जाती है तदुपरांत खेत में २*२ फिट की दुरी पर गड्डे से कम से कम १०० ग्राम अच्छी प्रकार की हुई गोबर खाद डाल दी जाती है।

मुख्य खेत में पिपली का रोपण- मानसून के प्रारम्भ होते ही पिपली के पौधें मुख्य खेत में रोपण कर दिया जाता है। प्राय: एक गड्ढे में दो पौधे का रोपण किया जाना उपयुक्त रहता है। मुख्य खेत में इन पौधे की रोपाई २*२ फिट की दुरी पर की जाती है।

आरोहण की व्यवस्था- पिपली की लताओं को चढाने के लिए आरोहण की व्यवस्था की जाना आवश्यक होता है। इसके लिए या तो उपरोक्त – नुसार खेत में अगस्ति, एरंड अथवा पांगरा रोपित किया जा सकता है अथवा सूखे डंठल गाड़ दिए जाते है जिन पर ये लताएं चढ़ जाती है। यदि आरोहण की उचित व्यवस्था की जाना आवश्यक होगा।

निंदाई-गुड़ाई की आवश्यकता- फसल की प्रारम्भिक अवस्था में खेत की हाथ से निदाई-गुड़ाई की जाना आवशयक होती है, ताकि पौधे के आसपास खरपतवारों को पनपने न दिया जाये। बाद में जब इन पौधो की लताए फ़ैल जाती है तो अतिरिक्त निदाई-गुड़ाई की आवश्यकता नहीं होती।

सिंचाई व्यवस्था-प्रति सप्ताह एक हलकी सिंचाई कर देने से फसल अच्छी वृद्धि प्राप्त कर लेती है। सिंचाई स्प्रिंकलर पद्धति से भी की जा सकती है तथा फ्लड इरिगेशन विधि से भी। वैसे इस फसल के ड्रिप विधि भी काफी उपयुक्त सिद्ध हो सकती है। नियमित अंतराल पर फसल की सिंचाई इसकी उपयुक्त वृद्धि के लिए आवश्यक है। गर्मी में जब फसल की सिंचाई नहीं की जाती तो उस समय पौधों के पास सुखी पास अथवा पत्ते आदि बिछाकर मल्विंग की जाती है।

फसल का पकना- रोपण के लगभग पांच-छ: माह के उपरांत पौधों पर फल (स्पाइक्स) बनकर तैयार हो जाते है। जब ये फल हरे काले रंग के हो तो इनको चुन लिया जाता है। कई स्थानों पर इन फलों की तुड़ाई वर्ष में एक ही बार (प्राय: जनवरी माह में) की जाती है। जबकि कई स्थानों में इन्हे समय-समय पर (तीन-चार बार में) तोड़ लिया जाता है। तुड़ाई के उपरांत इन फलों को धुप में डालकर ४-५ दिन तक अच्छी प्रकार सुखाया जाता है। जब ये अच्छी प्रकार सुख जाये तो इन्हे विपणन हेतु भिजवा दीया जाता है।

लताओं की कटाई-छटाई- प्राय: फसल ले लेने के उपरांत फरवरी-मार्च माह में पिपली के पौधे की कटाई-छटाई कर दी जाती है। कुछ समय उपरांत इन पौधो पर पुनः पत्ते आ जाते है तथा ये लताये पुनः फलने फूलने लगती है। कटाई-छटाई के उपरांत इन पौधो पर गोमूत्र तथा बोर्डो मिक्सचर की ड्रैचिंग/छिड़काव कर दिया जाना चाहिए। इस प्रकार प्रतिवर्ष इन पोधों की कटाई-छटाई करते रहते रहने से ये पौधे ४-५ वर्ष तक अच्छी फसल देते रहते है।

कटाई-छटाई से प्राप्त लताओं के आगे प्रवर्धन हेतु कलमे के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। पांच वर्ष के उपरांत पौधों को खोद करके मूल भी प्राप्त किये जाते है।

कुल उपज- प्रथम वर्ष पिपली के फसल से प्रति एकड़ लगभग (स्पाइक्स) प्राप्त होते है जो की तीसरे से पांचवे वर्ष में प्रति एकड़ लगभग २०० की.ग्रा। पिप्लामूल भी प्राप्त हो जाता है।